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Wednesday, 11 December 2013

बीते 100 सालोँ मे मिथिला के प्रति बिहार का रवैया :

Mithila Against BIHAR

 बीते 100 सालोँ मे मिथिला के प्रति बिहार का रवैया :

1. बिहार मेँ दो एयरपोर्ट गया और पटना मेँ, पूर्णियामे नाम
मात्र का एयरपोर्ट। जब बिहार मे किसी जगह एयरपोर्ट
नहीँ था उस समय दरभंगा मे था पर आज ? पटना एयरपोर्ट
पर उतरने वाले अधिकतर यात्री उत्तरी मिथिला केँ होते हैँ पर
उत्तरी मिथिला मे एक भी एयरपोर्ट नही जहां से लोग
यात्रा कर सकेँ, क्योँ ?

2. बिहार के राज्य गीत और राज्य प्रार्थना मेँ
   मिथिला को कोइ जगह नहीँ क्या मिथिला,बिहार मेँ नहीँ है ?

3. बिहार के गया और मोतिहारी मेँ नये केद्रीय
विश्वविद्यालय बनेँगेँ, क्या पूर्णिया/ मुजफ्फरपुर इस लायक
नहीँ हैँ ?

4. बिहार सरकार ने आजतक भारत सरकार से मिथिला मे
बाढ़ की समस्या को नेपाल के समक्ष उठाने
को नही कहा है, क्योँ ? उत्तरी मिथिला मेँ बाढ़ का निदान
नहीँ हो सका है, क्योँ ?

5. आजतक कोशी पर डैम नहीँ बन सका है अगर ये डैम बन
जाता तो मिथिला बिहार को 24 घंटे बिजली उपलब्ध
कराता! क्या ये नहीँ बनना चाहिये ?

6. बिहार के पटना, गया और हाजीपुर मेँ लो फ्लोर बसेँ
चलेँगी क्या दरभंगा/ भागलपुर/कटिहार इस लायक नहीँ हैँ ?

7. मैथिली बिहार की प्रमुख भाषा है, मैथिली बिहार
की एकमात्र क्षेत्रीय भाषा है जो भारतीय संविधान
की अष्टम अनुसूचीमे शामिल है तो फिर आज तक इसे बिहार
की दूसरी राजभाषा का दर्जा क्योँ नहीँ ? यहां ये
बताना जरुरी है की मैथिली नेपाल की द्वितीय
राष्ट्रभाषा है!

8. बिहार सरकार भोजपुरी फिल्मोँ को कर मेँ छूट देती हैँ पर
मैथिली फिल्मोँ को नहीँ, क्योँ ?

9. मिथिला मेँ आजतक प्रारंभिक शिक्षा मैथिली मेँ
देनी नहीँ शुरु की गयी,क्योँ ?

10. बिहार सरकार उर्दू, बांग्ला के
शिक्षकोँ की नियुक्ति कर रहीँ पर मैथिली के
शिक्षकोँ की नहीँ, क्योँ ?

11.  जो IIIT दरभंगा के लिए था उसे नीतीश कुमार छीन कर
बिहटा स्थानांतरित कराये, क्योँ ? 

12. 2008 के कोसी पीड़ितोँ को आजतक न्याय नहीँ मिल
सका है, क्योँ ? 

13. मिथिला क्षेत्र मे नये उद्योग धंधे लगाने की बात
तो छोड़िये जितने भी पुराने जूट मिल, पेपर मिल, चीनी मिल
आदि थे वे सारे क्योँ बंद हो गये ?

14. नीतीश कुमार मिथिला क्षेत्र मेँ होने वाले हर इक
सभा मेँ ये कहते हैँ की मिथिला के विकास के बिना बिहार
का विकास नहीँ हो सकता तो फिर उन्होँने मिथिला के
विकास के लिए अब तक क्या किया ?

   कितने कारण गिनाऊ, बिहार के मिथिला के प्रति उदासीन
के ? अब तो बिहार पर विश्वास ही नहीँ है, बीते 100
सालोँ मे धोखा, धोखा और सिर्फ धोखा!
 
     अब आप बताइये बिहारी मित्रोँ क्योँ न करु पृथक
मिथिला राज्य की मांग ?"

Monday, 2 December 2013

जन्तर-मन्तरपर ५ दिसम्बर अयबाक अपील सन्दर्भमे:   




मिथिला लेल प्राइवेट मेम्बरकेर बिल - संसदमे!

जाहि लेल ५ दिसम्बर बेसी संख्यामे जुटबाक अनुरोध कैल जा रहल अछि तेकर भूमिका स्पष्ट करब जरुरी बुझाइछ। 

सरकार द्वारा कानून बनेबाक लेल जे विधेयक बहस करबा लेल संसदमे राखल जाइछ तेकरा गवर्नमेन्ट बिल कहल जाइछ (वेस्टमिन्स्टर सिस्टम - जेकरा भारतीय संविधानसेहो अनुसरण करैछ) आ जे कैबिनेटसँ इतर सरकारक सहयोगी वा विरोधी पक्षक सदस्य द्वारा राखल जाइछ तेकरा प्राइवेट मेम्बर बिल मानल जाइछ। १९४७ केर तुरन्त बाद जखन मिथिला राज्यक माँग भारतीय संसदमे पास नहि भेल आ फेर राज्य गठन आयोग द्वारा सेहो १९५६ मे आरो-आरो नव राज्य गठन होयबा समय सेहो एकरा नकारल गेल तेकर बादसँ आधिकारिक बहस भारतीय संसदमे एहिपर नहि भेल अछि। ताहि लेल दरभंगासँ भाजपा संसद कीर्ति झा आजाद एहि विषयपर गंभीरतापूर्ण संज्ञान लैत बौद्धिकतासँ भरल ऐतिहासिकता आ उपलब्ध दस्तावेज सबकेँ समेटने अपना दिशिसँ मिथिलाक अस्मिताक रक्षा लेल डेग उठौलनि आ एहि क्रममे हुनका द्वारा प्रस्तुत बिल "बिहार झारखंड पुनर्संयोजन विधेयक २०१३" (The Bihar Jharkhand Reorganization Bill, 2013) संसदमे बहस लेल प्रस्तावित कैल गेल अछि। विधान अनुरूप कोनो बिलपर बहस लेल राष्ट्रपतिक मंजूरी आवश्यक रहनाय आ फेर समुचित तारीख दैत एहिपर बहस केनाय आ यदि सदन एकरा मंजूर करैत अछि तँ संविधानमे प्रविष्टि केनाय - यैह होइछ प्राइवेट मेम्बर बिल।

जेना ई बुझल अछि जे मिथिला राज्यक माँग भारतक स्वतंत्रता व ताहू सँ पूर्वहिसँ कैल जा रहल अछि - कारण बस एकटा जे "मिथिला अपना-आपमे परिपूर्ण इतिहास, भूगोल, संस्कृति, भाषा, साहित्य, संसाधन, समाजिकता आ सब आधारपर राज्य बनबाक लेल औचित्यपूर्ण अछि" आ भारतीय गणतंत्रमे राज्य बनबाक जे आधार छैक तेकरा पूरा करैत अछि.... दुर्भाग्यवश अंग्रेजक समयमे प्रान्त गठन करबा समय मिथिला लेल पूरा अध्ययनक बावजूद बस किछेक खयाली कल्पनासँ एकरा मिश्रितरूपमे 'बिहार' राज्य संग राखि देल गेल छल, मुदा बिहारसँ पहिले उडीसाक मुक्ति (१९३६) आ फेर झारखंडक मुक्ति (२०००) मे कैल गेल यद्यपि मिथिलाक माँग ताहू सबसँ पुरान रहितो एहिठामक लोकसंस्कृतिक संपन्नता आ लोकमानसक सहिष्णुताकेँ कमजोरी मानि बस सब दिन संग रहबाक लेल अनुशंसा कैल गेल... परञ्च जे विकास करबाक चाही से नहि कैल गेल, जे पोषण करबाक चाही सेहो नहि कैल गेल... उल्टा जेहो पूर्वाधार एहिठाम विकसित छल तेकरो धीरे-धीरे मटियामेट कय देल गेल। बिहारक शासनमे सब दिन मिथिला क्षेत्र उपेक्षित रहि गेल। एक तऽ प्रकृतिक प्रकोप जे बाढिक संग-संग सूखाक दंश, ऊपरसँ कोनो वैज्ञानिक वा विकसित प्रबंधन नहि कय बस दमन आ उपेक्षाक चाप थोपि मिथिलाक लोकमानसकेँ आन-आन राज्य जाय सस्ता मजदूरी आ चाकरीसँ जीवन-यापन करबाक लेल बाध्य कैल गेल। परिणामस्वरूप एहि ठामक विकसित आ सुसभ्य परंपरा सब सेहो ध्वस्त भेल, लोकसंस्कृतिक मृत्यु होमय लागल आ आब मिथिला मात्र रामायणक पन्नामे नहि रहि जाय से डर बौद्धिक स्तरपर स्पष्ट होमय लागल। तखन तऽ जे विधायक (जनप्रतिनिधि) एहिठामसँ चुनाइत छथि आ केन्द्र व राज्यमे जाइत छथि हुनकहि पर भार रहल जे मिथिलाकेँ कोना संरक्षित राखि सकता - लेकिन जाहि तरहक नीतिसँ मिथिलाकेँ विकास लेल सोचल गेल ताहिसँ उपेक्षा आ पिछडापण नित्यदिन बढिते गेल। हालत बेकाबू अछि, लोकपलायन चरमपर अछि, शिक्षा, उद्योग, कृषि, प्रशासन सब किछु चौपट देखाइत अछि। बिना राज्य बनने कोनो तरहक सुधारक गुंजाइश न्यून बुझाइछ।

हलाँकि भारतमे लगभग ३०० सँ ऊपर प्राइवेट मेम्बर बिल आइ धरि आयल, ताहिमे सँ बिना बहस केने कतेक रास गट्टरमे फेका गेल तऽ लगभग १४ टा विधानक रूपमे सेहो स्वीकृति पौलक। एहि बिलक भविष्य जे किछु होउ से फलदाता बुझैथ, लेकिन एक सशक्त-जागरुक चेतनशील मैथिलक ई कर्तब्य बुझापछ जे अपन राजनैतिक अधिकार लेल एना हाथ-पर-हाथ धेने नहि बैसैथ आ अपन अधिकार लेल आवाज धरि जरुर उठबैथ। यदि भारतीय गणतंत्रमे मिथिलाक मृत्यु तय छैक तऽ भारतक भविष्यनिर्माता सब जानैथ, लेकिन एक "मैथिल" लेल अपन भागक कर्तब्य निर्वाह करबाक जरुरत देखैत अपील कैल जा रहल अछि जे जरुर बेसी सऽ बेसी संख्यामे जन्तर-मन्तरपर ओहि बिलकेर समर्थन लेल राजनैतिक समर्थन जुटेबाक उद्देश्यसँ आ मिथिला राज्य संयुक्त संघर्ष समिति द्वारा राखल गेल धरनामे सद्भाव-सौहार्द्रसंग सहभागिता लेल सेहो हम सब पहुँची। अपन अधिकार लेल संघर्ष करहे टा पडैत छैक, बैसल कतहु सँ कोनो सम्मान वा स्वाभिमान प्राप्त नहि भऽ सकैत छैक, ई आत्मसात करैत हम सब एकजुटता प्रदर्शन करी।

याद रहय - ५ दिसम्बर, २०१३, स्थान जन्तर-मन्तर, समय दिनक १० बजेसँ।

Saturday, 30 November 2013

MITHILA AND MAITHILI

Maithili language

Maithili (/ˈmaɪtɨli/;[2] मैथिली, মৈথিলী, Maithilī) is an Indo-Aryan language spoken in eastern Nepal and North Bihar of India 
 It is presently written with the Devanagari script despite having its own Mithilakshar script
In 2003, Maithili was included in the Eighth Schedule of the Indian Constitution, which allows the language to be used in education, government, and other official contexts.

Geographic distribution

Maithili is spoken in Bihar up to the Purnia, Munger and Bhagalpur districts parts of southeast Nepal. The cultural and linguistic centers are the towns of Madhubani and Darbhanga. Native speakers also reside in Delhi, Calcutta and Mumbai.[1] Maithili is also spoken in Sitamarhi, Saharsa, Madhepuraand Supaul.
In Nepal, Maithili is spoken mainly in the Outer Terai districts of the Janakpur Zone such as Sarlahi, Mahottari and Dhanusa Districts, in the Sunsari District of the Koshi Zone, and in the Siraha and Saptari Districts of the Sagarmatha Zone. Janakpur is an important religious centre.

Classification

The first grammar of Maithili was written in 1880–81. A. F. Rudolf Hoernle published a grammar of the eastern Hindi from London in 1880 and compared with the other Gaudian languages. In this grammar, Dr. Hoernle recognized Maithili as a dialect distinct from Hindi. He was able to give some specimens of its grammatical forms, but no published materials were then available. The mis-classification by early linguists led to language politics in respect of Maithili.[3] Beames (1872/reprint 1966: 84-85) considered Maithili as a dialect of Bengali.[4] Grierson, however, adopted the notional term "Bihari" for the group of languages (Angika,Bajjika,Bhojpuri, Magahi, Maithili) including Maithili used in Bihar. 
Maithili is derived from Avahattha, the Maithil Apabhramsha, which is derived from Magadhi Apbhramsha.

Dialects

·         Central Maithili is the standard form, in which books are written. Central Maithili is spoken in the districts of Darbhanga divisionKosi Division.
·         Khortha dialect
·         Vajjika dialect
·         Tharuwat, spoken exclusively in Nepal
·         Jolaha Maithili, not a dialect but a variety spoken by Muslims of Mithila. It has no specific region.

History

The name Maithili is derived from the word Mithila, an ancient kingdom of which King Janaka was the ruler (See Ramayana). Maithili is also one of the names of Sita, the wife of King Rama and daughter of King Janaka. Scholars in Mithila used Sanskrit for their literary work and Maithili was the language of the common folk (Abahatta). The earliest work in Maithili appears to be Varna(n) Ratnakar by Jyotirishwar Thakur dated about 1324.
With the fall of Pala rule, disappearance of Buddhism, establishment of karnāta kings and patronage of Maithili under Harasimhadeva (1226–1324) of karnāta dynasty, Jyotirisvara Thakur (1280–1340) wrote a unique work Varnaratnākara in pure Maithili prose, the earliest specimen of prose available in any Modern Indo-Aryan language.
In 1324, Ghyasuddin Tughluq, the emperor of Delhi invaded Mithila, defeated Harasimhadeva, entrusted Mithila to his family Priest Kameshvar Jha, a Maithil Brahmin of the Oinvar family but disturbed era did not produce any literature in Maithili until Vidyapati Thakur (1360 to 1450), who was an epoch making poet under the patronage of king Shiva Simha and his queen Lakhima Devi. He produced over a thousand immortal songs in Maithili on the theme of erotic sports of Radha and Krishna and the domestic life of Shiva and Parvatias well as on the subject of suffering of migrant labourers of Morang and their families; besides he wrote a number of treaties in Sanskrit on various subjects. His love-songs spread far and wide in no time and enchanted saints, poets and youth in general. Chaitanya Mahaprabhu saw divine light of love behind these songs, and soon these songs became themes of Vaisnava sect of Bengal. Rabindranath Tagore, out of curiosity, imitated these songs under the pseudonym Bhanusimha. Vidyapati influenced the religious literature of Asama, Banga and Utkala.
After the invasion of Mithila by the Sultan of Johnpur, Delhi, and the disappearance of Shivasimha in 1429, Onibar rule grew weaker and the literary activity shifted to present Nepal.
The earliest reference to Maithili or Tirhutiya is in Amaduzzi's preface to Beligatti's Alphabetum Brammhanicum, published in 1771. This contains a list of Indian languages amongst which is 'Tourutiana.' Colebrooke's essay on the Sanskrit and Prakrit languages, written in 1801, was the first to describe Maithili as a distinct dialect.
Many devotional songs were written by vaisnava saints, including in the mid-17th century, Vidyapati and Govindadas. mapati Upadhyaya wrote a drama entitled pārijātaharaṇa in Maithili. A number of professional troupes, mostly from dalit classes known as Kirtanias, the singers of bhajan or devotional songs, started to perform this drama in public gatherings and the courts of the nobles. Lochana (c. 1575 – c. 1660) wrote Rāgatarangni, a significant treatise on the science of music, describing the rāgas, tālas and lyrics prevalent in Mithila.
The Malla dynasty's mother tongue was Maithili, which spread far and wide throughout Nepal from the 16th to the 17th century.[citation needed] During this period, at least 70 Maithili dramas were produced. In the drama Harishchandranrityam by Siddhinarayanadeva (1620–57), some characters speak pure colloquial Maithili, while others speak Bengali, Sanskrit or Prakrit. The Nepaltradition may be linked with the Ankiya Nāta in Assam and Jatra in Odisha.[citation needed]
After the demise of Maheshwar Singh, the ruler of Darbhanga Raj, in 1860, the Raj was taken over by the British Government as regent. The return of the Darbhanga Raj to his successor, Maharaj Lakshmishvar Singh, in 1898. But these happenings has nothing to do with the use of Maithili Language, as the Zamindari Raj has lackadaisical approach towards Maithili Language. The use of Maithili language was revived, however, through personal efforts of MM Parameshvar Mishra, Chanda Jha, Munshi Raghunandan Das and others.
Publication of Maithil Hita Sadhana (1905), Mithila Moda (1906), and Mithila Mihir (1908), further encouraged writers. The first social organization, Maithil Mahasabha was established in 1910 for the development of Mithila and Maithili, but it blocked its membership for people outside from the Maithil Brahmin and Karna Kayastha castes. Maithil Mahasabha campaigned for the official recognition of Maithili as a regional language. Calcutta University recognized Maithili in 1917, and other universities followed suit. Babu Bhola Lal Das also wrote Maithili Grammar (Maithili Vyakaran"). He edited a book "Gadyakusumanjali" and edited a journal "Maithili".
In 1965, Maithili was officially accepted by Sahitya Academy, an organization dedicated to the promotion of Indian literature. In 2003 Maithili was recognized on the VIII schedule of the Indian Constitution as a major Indian language; Maithili is now one of the 22 national languages of India.
The publishing of Maithili books in Mithilakshar script was started by Acharya Ramlochan Saran.

Writing system

Maithili was traditionally written in the Maithili script (also known by the names Tirhuta, i.e., Mithilakshar) and Kaithi script. The ISO of Unicode Technical Committee has approved the encoding of Kaithi and Tirhuta scripts. Nowadays, Devanagari script is most commonly used. An effort is underway to preserve the Maithili script and to develop it for use in digital media by encoding the script in the Unicode standard, for which proposals have been submitted by Sh. Anshuman Pandey (now it has been approved by the ISO, the Unicode Technical Committee).

Literature

The most famous literary figure in Maithili is the poet Vidyapati (1350–1450), who wrote his poems in the language of the people, i.e., Maithili, at a time when state's official language used to beSanskrit and Sanskrit was still being used as a literary language. The use of Maithili, instead of Sanskrit, in literature became more common after Vidyapati.
The main characteristics of Magadhi Prakrit is to mutate 'r' into 's', the 'n' for n, of 'j' for 'y', of 'b' for 'y' In the edicts of Ashoka the change of 'r' to 'h' is established. Mahavir and Buddha delivered their sermons in the eastern languages. The secular use of language came mainly from the east as will be evident from the Prakritpainglam, a comprehensive work on Prakrit and Apabhramsa-Avahatta poetry. Jyotirishwar mentions Lorika. Vachaspati II in his Tattvachintamani and Vidyapati in his Danavakyavali have profusely used typical Maithili words of daily use. The Maithili script, Mithilakshara or Tirhuta as it is popularly known, is of a great antiquity.. The Lalitavistara mentions the Vaidehi script. Early in the latter half of the seventh century A. D., we find a marked change in the north-eastern alphabet and the inscriptions of Adityasena exhibit this change for the first time and hence forward the eastern variety develops by itself and becomes the Maithili script—a script which ultimately comes into use in Assam, Bengal and Nepal. The earliest recorded epigraphic evidence of the script is to be found in the Mandar Hill Stone inscriptions of Adityasena (c. 7th century A. D.), now fixed in the Baidyanath temple, Deoghar.[12]
The Kamrupa dialect was originally a variety of eastern Maithili and it was, no doubt, the spoken Aryan language throughout the kingdom which then included the whole of Assam valley and whole of North Bengal with the addition of the district of Purnea. The language of the Buddhist Dohas is described as belonging to the mixed Maithili—Kamrupi language.[13]

Early Maithili Literature (ca. 700–1350 AD)

The period was of ballads, songs, and dohas. Some important Maithili writers of this era were:
·         Kavi Kokil Pre-Jyotirishwar Vidyapati
·         Jyotirishwar Thakur (1290–1350) whose 'Varnartnakar' is the first prose and encyclopedia in any north Indian language

Middle Maithili Literature (ca. 1350–1830 AD)

The period was of theatrical writings. Some important Maithili writers of this era were:
·         Vidyapati (1350–1450)
·         Srimanta Sankardeva (1449–1568)
·         Govindadas

Modern Maithili Literature (1830 AD to date)

Modern Maithili came into its own after Sir George Abraham Grierson, an Irish linguist and civil servant, tirelessly researched Maithili folklore and transcribed its grammar. Paul R. Brass wrote that "Grierson judged that Maithili and its dialects could fairly be characterized as the language of the entire population of Darbhanga and Madhubani districts".[14] In April 2010 a translation of the New Testament into Maithili was published by the Bible Society of India under joint copyright with Wycliffe Bible Translators.
The development of Maithili in modern era was due to various magazines and journals. Some important writers of this era are:
·         Acharya Ramlochan Saran (1889–1971)
·         Baldev Mishra (1890–1975)[15]
·         Surendra Jha 'Suman' (1910–2002) represented Maithili in the Sahitya Akademi
·         Radha Krishna Choudhary (1921–1985)
·         Sudhanshu Shekhar Chaudhary (1920–1990) authored plays in Maithili and received the Sahitya Akademi Honour in 1981.
·         Jaykant Mishra (20 December 1922 – 3 February 2009) represented Maithili in the Sahitya Akademi
·         Jata Shankar Das (1923–2004)
·         Rajkamal Chaudhary (1929–1967)
·         Binod Bihari Verma (1937–2003)
·         Gajendra Thakur (1971– )
·         Dr Raman Jha (1957– )



चलो जन्तर-मन्तर पर! ५ दिसम्बर, २०१३



चलो जन्तर-मन्तर पर! 

५ दिसम्बर, २०१३   

      (जन्तर-मन्तरपर विशाल धरना प्रदर्शन - मिथिला राज्यके समर्थनमें - संसदमें रखे गये बिलपर सकारात्मक बहसके लिये राजनीतिक शक्तियोंसे सामूहिक अनुरोध के लिये।)

वैसे तो मिथिला राज्यका माँग स्वतंत्रता पूर्वसे ही किया जा रहा है, स्वतंत्रता उपरान्त भी यह माँग देशकी प्रथम संविधान सभाके सत्रोंसे लेकर राज्य पुनर्गठन आयोग तक मंथनका विषय बननेके बावजूद राजनीतिपूर्वक किसी न किसी बहानेमे नकारा गया और मैथिली सहित मिथिलाके भविष्यको पहचानविहीनताकी रोगसे आक्रान्त किया गया जो निसंदेह किसी गणतंत्रात्मक प्रजातांत्रीक मुल्कके सर्वथा-हितमे नहीं हो सकता है। फलस्वरूप अब मिथिलाका वो स्वर्णिम समय दुबारा भारतको शास्त्र-महाशास्त्रके साथ आध्यात्मिक दर्शनकी पराकाष्ठापर पहुँचा सके, हाँ आज इतना तो जरुर है कि मिथिलाके मिट्टी और पानीसे सींचित व्यक्तित्व न केवल राष्ट्रमे बल्कि समूचे ग्लोबपर अपनी उपस्थिति ऊपरसे नीचेतक हर पद व स्थानपर महिमामंडित करते हैं, लेकिन मूलसे बिपरीत आज सामुदायिक कल्याण निमित्त नहीं होता - बस व्यक्तिगत विकास केवल लक्ष्य बनकर पहचानविहीनताके रोगसे मिथिला-संस्कृति विलोपान्मुख बनते जा रहा है। ऐसेमें यदि अब स्वतंत्रताका लगभग ७ दशक बीतने लगनेपर भी मिथिलाको स्वराज्यसे संवैधानिक सम्मान नहीं दिया गया तो मिथिलाका मरणके साथ भारतकी एक विलक्षण संस्कृतिका खात्मा तय है।

           भारतमे विभिन्न नये राज्य बनानेकी परिकल्पना आज भी निरंतर चर्चामें रहता ही है। संसदसे सडकतक इस विषयपर नित्य विरोधसभा और संघर्ष कर रही है यहाँकी जनता, खास करके जिनका पहचान समाप्तिकी दिशामे बढ रहा है और उपनिवेशी पहचानकी बोझसे अधिकारसंपन्नताकी जगह विपन्नता प्रवेश पा रहा है वहाँपर नये राज्योंकी सृजना अनिवार्य प्रतीत होता है। बिहार अन्तर्गत मिथिला हर तरहसे पिछड गया, ना बाढसे मुक्ति मिल सका, ना पूर्वाधारमें किसी तरहका विकास, ना उद्योग, ना शिक्षा, ना कृषिमें क्रान्ति या आत्मनिर्भरता, ना भूसंरक्षण या विकास, ना जल-प्रबंधन और ना ही किसी तरहका लोक-संस्कृतिकी संवर्धन वा प्रवर्धन हुआ। बस नामके लिये सिर्फ मिथिलादेश अब मिथिलाँचल जैसा संकीर्ण भौगोलिक सांकेतिक नामसे बचा हुआ है। राजनीति और राजनेताके लिये मिथिलाका पिछडापण मुद्दा तो बना हुआ है लेकिन वो सारा केवल कमीशनखोरी, दलाली, ठीकेदारी, लूट-खसोट और अपनी राजनैतिक लक्ष्यतक पहुँचने भर के लिये। मिथिला भारतीय गणतंत्रमें मानो दूधकट्टू संतान जैसा एक विचित्र पहचान 'बिहारी' पकडकर मैथिली जैसे सुमधुर भाषासे नितान्त दूर 'बिहारी-हिन्दी'की भँवरमें फँसकर रह गया है।


                जिस बलसे मिथिला कभी मिथिलादेश कहा जाता रहा, जिस तपसे जहाँकी धरासे साक्षात् जगज्जननी स्वयं सिया धियारूपमे अवतार लीं, जहाँ राजनीति, न्याय, सांख्य, तंत्र, मिमांसा, रत्नाकर आदि सदा हवामें ही घुला रहा... उस मिथिलाको पुनर्जीवन प्रदान करने के लिये स्वराज्य देना भारतीय गणतंत्रकी मानवृद्धि जैसा होगा ‍- अत: मिथिला राज्यकी माँगवाली विधेयक काफी अरसेके बाद फिरसे भारतीय संसदमें बहसके लिये आ रही है। किसी एक नेता या किसी खास दलका प्रयास भले इसके लिये ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो, लेकिन जरुरत तो सभी पक्षों और राष्ट्रीय सहमतिका है जो इस माँगकी गंभीरताको समझते हुए वगैर किसी तरहका विद्वेषी और विभेदकारी आपसी फूट-फूटानेवाली राजनीति किये न्यायपूर्ण ढंगसे मिथिला राज्यको संविधान द्वारा मान्यता प्रदान करे। इसमें कहीं दो मत नहीं है कि नेतृत्वकी भूमिकामें जितने भी संस्था, व्यक्ति, समूह, आदि भले हैं, पर मुद्दा तो एकमात्र 'मिथिला राज्य' ही है और इसके लिये एकजुटता प्रदर्शनके समयमें हम सब मात्र मिथिला राज्यका समर्थक भर हैं और मिथिलाकी गूम हो रही अस्मिताकी संरक्षणके लिये, मिथिलाकी चौतरफा विकासके लिये, मिथिलाकी खत्म हो रही लोक-संस्कृति और लोक-पलायनको नियंत्रित रखने के लिये अपनी उपस्थिति जरुर दिल्लीके जन्तर-मन्तरपर और भी अधिक लोगोंको समेटते हुए जरुर दें। तारीख ५ दिसम्बर, समय १० बजेसे, स्थान जन्तर-मन्तर, संसद मार्ग, नयी दिल्ली!


मिथिलावासी एक हो! एक हो!! एक हो!!

एकमात्र संकल्प ध्यानमे!
मिथिला राज्य हो संविधानमे!!

भीख नहि अधिकार चाही!
हमरा मिथिला राज्य चाही!!

जय मिथिला! जय जय मिथिला!!